Wednesday, June 3, 2009

रोना छोड़ दिया है


रज्जू रोया नहीं
आज वह बदल गया है
अब तक तो रोता ही रहा
बिखरने की हालत छोड़
आज वह संभल गया है
किसी गीत में
बंगला न्यारा बन जाता है
वास्तव में
कुनबे भी बिखरे हैं.
भावुकता का रूदन
ज्ञान से सचेत हो जाता है.
चाहतों की भी सीमाएँ
अब बन गई है जो
धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी
पर
परिस्थितियों का नियंत्रण
घटता जा रहा है.
रज्जू नियंत्रण की क्षमताओं से
जूझ रहा है
रोना छोड़ दिया है!

5 comments:

Mrs. Asha Joglekar said...

रज्जू नियंत्रण की क्षमताओं से
जूझ रहा है
रोना छोड़ दिया है!
आज के यथार्थ का सही चित्रण ।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुन्दर रचना।

Nirmla Kapila said...

अखिर रज्जू के आँसू भी कब तक साथ देते सुन्दर अभिव्यक्ति है

venus kesari said...

सुन्दर कविता भावः पूर्ण प्रस्तुती
वीनस केसरी

dr. ashok priyaranjan said...

भाव और शिल्प की दृष्टि से आपकी अभिव्यक्ति बड़ी प्रखर है । सीधे सरल शब्दों का प्रयोग सहज ही प्रभावित करता है । वैचारिकता को प्रेरित करती आपकी रचना अच्छी लगी ।

मैने अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा है-फेल होने पर खत्म नहीं हो जाती जिंदगी-समय हो पढें और कमेंट भी दें-

http://www.ashokvichar.blogspot.com