
थक गई हूँ रोज-रोज
पतझड को
बुहारते बुहारते,
गिर जाने दो
जमीं पर
सारे पत्तों को
एक एक कर,
कि
मैं समेट सकूँ
एक साथ सबको।
Sunday, February 7, 2010
थक गई हूँ रोज-रोज
Posted by अपराजिता at 12:49 PM 5 comments
Tuesday, February 2, 2010
ऐसी आवाज़ दे दो

अगर मैं दिल हूँ तुम्हारा,
तो मुझे ये दिल दे दो.
मैं माफ़ी नहीं चाहती,
बस हाथों में हाथ दे दो.
ज़िन्दगी भर न भूलूँ जो मैं,
वो अहसास दे दो.
बख्श दो मुझको - यूँ पल,
तुम तड़पाओ ना,
सोने से पहले
अपना एक ख्वाब दे दो.
आती-जाती सांसों में
एक शब्द सा सुनती हूँ,
इन धुंधले शब्दों को सुन सकूं मैं,
ऐसी इन्हें आवाज़ दे दो.
अगर कुछ न दे सको तो
फिर इतना करना,
जो कल मिलनी है
वो मौत आज दे दो.
________________चेतना
Posted by अपराजिता at 6:50 PM 4 comments
Wednesday, December 30, 2009
ठूँठ में बदल गए

कुछ बंद दरवाजे हैं
कुछ रोज़ सुनी जाने वाली आवाज़ें
दीवारें हैं,
और बहुत कुछ है बिखरा हुआ
जिसे रोज़ समेटती हूँ
बस यही तो करती हूँ
अपनी ज़िन्दगियों को “हमारी” बनाने की कोशिश में
जितनी बार मुँह खोलती
बाँहें फैलाती
उतनी बार नासमझ करार दी जाती
उलटबाँसियों से दबा दिया जाता
उछलता कूदता मेरा मन
अनर्थों में जीता हमारा आज
अपने अपने भविष्य की ओर
अकेला ही बढ़ता जा रहा है
मेरे आँसू मेरा दर्द मेरा प्रेम
सिर्फ मेरे बनकर मुझमें ही विलीन होने लगे
जहाँ तक पहुँचकर इनको फलना था
वहाँ पहुँचकर ठूँठ में बदल गए...
Posted by अपराजिता at 10:41 AM 3 comments
Sunday, December 27, 2009
मेरी उम्मीद

दिन उगता है तो उम्मीद करती हूँ
दोपहर होने पर उम्मीद करती हूँ
दिन ढलने पर भी उम्मीद करती हूँ
रात को उसी उम्मीद के साथ
अपने बिस्तर पर
कम्बल में लिपटकर
सो जाते हैं
मैं और मेरी उम्मीद !
Posted by अपराजिता at 1:38 PM 9 comments
