बस स्टैंड पर बैठी लड़की कि नज़र
डूबते सूरज कि लालिमा पर पड़ी और उसकी आँखे चमक उठी
उसने तुरंत उस बेहद दिलकश नज़ारे को साझा करने के लिए
बगल ही में बैठे प्रेमी से कहा
देखो मुझे उसमे तुम ही दिख रहे हो.....
तुम्हारा नाम आसमान कि लाल बिंदी बन गया है......
प्रेमी ने उसकी उत्सुक आँखों में डूबते हुए
हिंदी फिल्म के गाने कि एक लाइन दोहराई
''तेरे चेहरे से नज़र नहीं--
हटती नज़ारे हम क्या देखें''....
लड़की समझी बस दुनिया इसी एक पंक्ति में सिमट आई है ......
समय के घूमते पहिये पर एक शाम ऐसी भी आई
जब उसी लड़की ने डूबते सूरज को देख प्रेमी को देखा
और उसने कहा......
क्या ?
कुछ कहना चाहती हो ?
Thursday, December 8, 2011
लड़की की नज़र
Tuesday, November 15, 2011
बाज़ार में बिक रही थी
हत्या करके लायी गई
मछलियाँ
ढेर पर ढेर लगी
मरी मछलियाँ
धड़ कटा-खून सना
बदबू फैलाती बाज़ार भर में.
मरी मछलियों पर जुटी भीड़
हाथों में उठाकर
भांपती उनका ताज़ापन
लाश का ताज़ापन.
भीड़ जुटी थी
मुर्गे की दूकान पर
बड़े-बड़े लोहे के पिंजरों में
बंद सफ़ेद-गुलाबी मुर्गे या मुर्गियाँ
मासूम आँखों से भीड़ को ताकते
और भीड़ ताकती उनको
भूखी निगाहों से.
अपनी बाँह के दर्द में
तड़पड़ाते आदमी ने
दबाकर बाँह को पकड़ा था इसतरह
कि कोई छू ना पाए
दर्द कहीं बढ़ ना जाए
दुकानदार से कहता
मेरे लिए ये मुर्गा जल्दी काट दो भाई
मैं दर्द से खड़ा नहीं हो पा रहा!
क्षण भर में मासूम मुर्गे की देह से
अलग कर दिए गए
दो आँख, चोंच और पैर.
Monday, November 29, 2010
बातें
बातें
सायास नहीं
अनायास की जाए तो
ज़्यादा सुंदर होती हैं.
बातें
लफ़्ज़ों से नहीं
आँखों से की जाए तो
ज़्यादा मार्मिक होती हैं.
बातें
हिचक से परे
हृदय के उच्छवास से आये तो
ज़्यादा स्थान लेती हैं.
बातें
क्षणिक प्रतिक्रिया से नहीं
स्वप्न के आशियाने में सजे तो
ज़्यादा उम्र पाती हैं.
इसतरह बातें
भरती है
जीवन में अर्थ
और
रचती हैं
संबंधों की गरिमा
सायास नहीं
अनायास की जाए तो
ज़्यादा सुंदर होती हैं.
बातें
लफ़्ज़ों से नहीं
आँखों से की जाए तो
ज़्यादा मार्मिक होती हैं.
बातें
हिचक से परे
हृदय के उच्छवास से आये तो
ज़्यादा स्थान लेती हैं.
बातें
क्षणिक प्रतिक्रिया से नहीं
स्वप्न के आशियाने में सजे तो
ज़्यादा उम्र पाती हैं.
इसतरह बातें
भरती है
जीवन में अर्थ
और
रचती हैं
संबंधों की गरिमा
अनवरत ....
Thursday, October 7, 2010
माँ और मैं
माँ से पहले मैं
न तत्व थी
न अस्तित्व था
न जान थी
न जीवन था
माँ ने दिया सब कुछ मुझे
हे माँ अपर्ण हर पल तुम्हें
जीवन में आने से पहले
माँ ने मुझे अपना गर्भ दिया
जीवन में आने पर मुझे
अपने तन से भोजन दिया
जीवन का हर एक पल
आपके कर्ज में डूबा हुआ
जीवन का हर पल आपके
प्यार से सींचा हुआ
महिमा कभी न जान सकूँ
शायद आपके रूप की
भूख मेरी बढ़ रही प्रत्येक पल
आपके साथ व स्नेह की !!!
-------------रचनाकार : चेतना शर्मा
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