यूँ तो देह के भीतर छिपा है
कहीं मन
कहीं वो
लोग जिसे भावों का पुंज कहते हैं
लेकिन दुनिया का ढाँचा
इसके बिल्कुल उलट है
वहाँ मन दिखता है
ऊपर-ऊपर,
सब तरफ मित्रता
भाईचारा,
नैतिकता,
लेकिन बस ऊपर-ऊपर.
इसके ठीक नीचे
बहुत गहरे बहुत विस्तृत
फैली है देह
देह की बू
जब कभी उठ जाती है ऊपर तक
तब सड़ने लगता है मन
गंधियाने लगता है दिमाग
पिलपिला हो जाती है दुनिया
वो दुनिया
जिसका अधिकार
पुरूष के हाथ में है.
4 comments:
vah aprajitaji bahut sahi abhivyakti hai magar aap to aprajita ho fir purush kese havi ho sakta hai han dunia ka dhancha bilkul yahi hai abhar aur shubhkamnayen
अच्छी भावाभिव्यक्ति। सुन्दर रचना। वाह अपराजिता जी।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
shandar abhivyakti ek anoothe dhang mein.
kvita achchhi lagi...
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