Sunday, July 13, 2008

उनकी आँखें

बाँट लिया करती हैं,
उनकी आँखें.
चुपके से हौले से न जाने क्या
छोड़ दिया करती हैं
उनकी आँखें.
भाँप लिया करती है मेरा ग़म
मेरी उदासी मेरी बौखलाहट,
मन तक टटोल लिया करती है
उनकी आँखें.
उनकी आँखें
जिनमें ज़िंदगी है रंग है
सपने हैं जो संग है,
सच कहूँ
मेरा आईना है
उनकी आँखें.

3 comments:

परमजीत बाली said...

सुन्दर अभिव्यक्ति हैं।

नीरज गोस्वामी said...

काश ऐसी आँखे सब को मिलें...
बहुत सुंदर प्रस्तुति...
नीरज

प्रभाकर पाण्डेय said...

सुंदरतम रचना।