Wednesday, September 8, 2010

शादी के बाद अपना नाम















मायके से लेते हुए विदा,
बस यही ले आई थी साथ
जो कि रह सकेगा उम्र भर
मेरा ‘अपना’ 
लेकिन परम्परा, रीति के नाम पर
वह भी मुझसे छीन लिया जायेगा !!
जैसे छीन लिया
बाबा को
आई को
भाई-बहन को
उस आँगन को
जिसमें महक रहा होगा
मेरा अस्तित्व आज भी!!
छोड़ दिया अगर इसे भी-
तो खत्म हो जाएगी
मेरे जन्म की कहानी
मेरा सारा बचपन
उसने कितनी आसानी से कह दिया
तुमने आज भी
नहीं बदला अपना नाम
शादी के बाद तो लड़कियाँ
पति के नाम से ही जानी जाती हैं ना !!!

13 comments:

वन्दना said...

पहचान को पह्चान देती एक सशक्त और मार्मिक रचना……………सच अपनी पहचान से समझौता नही करना चाहिये।

रवीन्द्र दास said...

pehchan badalna koi dukhad ghatna nahi hai. har budhhiman vyakti apni pehchan badlne me hi laga rahta hai. nahi?

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सार्थक अभिव्यक्ति ....

अनामिका की सदायें ...... said...

आप की रचना 10 सितम्बर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
http://charchamanch.blogspot.com


आभार

अनामिका

Sadhana Vaid said...

स्त्रियों के अस्तित्व एवम अहम् को चोट पहुंचाने वाली बेमानी परम्पराओं पर सटीक प्रहार ! सुन्दर रचना ! बधाई एवम् शुभकामनाएं !

http://sudhinama.blogspot.com
http://sadhanavaid.blogspot.com

उपेन्द्र " the invincible warrior " said...

sunder bhav ke sath ek sunder si kavita aapne prastut ki hai........

very nice.

upendra ( www.srijanshikhar.blogspot.com )

रंजना said...

झकझोरती रचना...

ओशो रजनीश said...

अच्छी पंक्तिया लिखी है ........

इसे पढ़े और अपने विचार दे :-
कुछ अनसुलझे रहस्य ...१

संजय भास्कर said...

सशक्त और मार्मिक रचना…

संजय भास्कर said...

गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना...

अपराजिता said...

दास सर जिस पहचान का ज़िक्र कर रहे हैं वो एकदम अलग चीज़ है............... हम औरतें खुद के नाम से पहचाने जाना चाहते है न की किसी कुल में ब्याह दिए जाने से..... में समझती हूँ इस कविता का पथ बहुत अभिधात्मक है

रवीन्द्र दास said...

अपराजिता,
बहुत दिनों बाद मैंने तुम्हारी कविता पर अपनी टिप्पणी का जबाव देखा, इस बात मुझे हार्दिक अफ़सोस है. लेकिन मैं यह सोचता भी हूँ और आप जैसे गंभीर लोगों से पूछता भी हूँ कि यह अभिधामूलक 'ध्वनियाँ' कहीं हमें विपथ नहीं कर रहीं ? कविता का कथ्य मुझे मुझे गहरे तक प्रभावित कर रहा है और मेरी, मैं दुबारा कहना चाहता हूँ कि मेरी, अभिलाषा थी कि इस भावबोध पर कोई व्यंजनामूलक कविता, तुम्हारी लिखी कविता, पढता. धन्यवाद.

PUKHRAJ JANGID पुखराज जाँगिड said...

अपने अस्तित्त्व को टटोलती कविता पंक्तियाँ।
बस एक चाह कि 'मेरा अपना...' भी कुछ हो लेकिन वह भी किसी को स्वीकार्य नहीं और उससे 'उसका अपना' सबकुछ छीन लिया जाता है।
व्यवस्था या सत्ता परिवर्तन की चाह या अपनी स्वतंत्र जगह बनाने की अद्मय लालसा...
शुभकामनाएं...