Sunday, August 8, 2010

आज भी छिपी बैठी है














तुम्हारी कनखियों में कहीं
आज भी छिपी बैठी है
मेरी मुस्कान....
जिसे तुम्हारी आँखों की चमक से,
चुरा लिया था मैंने !!
अब भी तुम्हारे हाथों में रची है
मेरे तन की महक
मेरी नम हथेलियों पर
अब भी महक उठता है,
तुम्हारा चमकीला स्वेद....!!
मेरी उलझी लटें
अब भी यकायक निहारने लगती हैं
तुम्हारी भरी पूरी उंगलियाँ…
मद्धम हवा सी उनकी सरसराहट
अब भी कानों को गुदगुदाती है !!
जब तुम अचानक देखते हो,
अब भी भीड़ में मेरी ओर प्यार से…
उसी तरह ठिठक जाती हूँ
जैसे गई थी ठिठक
तपते जून की भरी दुपहर में…!!
तुम्हारे सीने पर उकेरते हुए चित्र
मैं आज भी भविष्य रचती हूँ
रचने के इसी क्रम में ही तो,
रचा था मैंने आज को !!!

9 comments:

अमिताभ मीत said...

बहुत ख़ूब !!

वन्दना said...

अपनी पोस्ट के प्रति मेरे भावों का समन्वय
कल (9/8/2010) के चर्चा मंच पर देखियेगा
और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

mai... ratnakar said...

जब तुम अचानक देखते हो,
अब भी भीड़ में मेरी ओर प्यार से…
उसी तरह ठिठक जाती हूँ
जैसे गई थी ठिठक
तपते जून की भरी दुपहर में…!!

ultimate! bahut achchha likha hai

Mahendra Arya said...

Bahut sundar!

अनामिका की सदायें ...... said...

बहुत खूबसूरत शब्दों से मन के भावो को पिरो सुंदर कविता का सृजन किया है.

बधाई.

डॉ० डंडा लखनवी said...

एक ईमानदार प्रयास।
......सफलता आपके चरण चूमे।
सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

संजय भास्कर said...

बहुत खूबसूरत ब्लॉग मिल गया, ढूँढने निकले थे। अब तो आते जाते रहेंगे।

संजय भास्कर said...

हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

संजय भास्कर said...

सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है।