Wednesday, February 17, 2010

चुगलख़ोर सुर्ख गुलाब








चुगलख़ोर सुर्ख गुलाब

खोल गया मेरे सीने में दफ़्न राज़

यूं तो आंखों से छलकता था

तुमने देखा नहीं

होंठों पर थिरकता था

तुमने सुना नहीं

रोम रोम में उछलता था

तुमने छुआ नहीं

और चुगलख़ोर गुलाब ने

सब कह दिया!

3 comments:

ravish yadav said...

nice but rythm is always necessary....

Mithilesh dubey said...

बहुत खूबसूरत रचना लगी ,।

संजय भास्कर said...

ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है