
लोग देखते हैं
तुम्हारा चेहरा
तुम्हारा बदन
तुम्हारा काम
और अंदाजा लगा लेते हैं
बल्कि यक़ीनन जान लेते हैं
तुम्हारे व्यक्तित्व को,
तुम्हारी तेज चलती ज़बान
पुरूषों को
संस्कृति, सभ्यता, परम्परा जैसी चट्टानों पर
भीम के गदा की गूँज-सी सुनाई पड़ती है।
तुम्हारा थिरकता बदन
जिन्हें टीवी का चैनल बदलने नहीं देता
वह तुम्हारे घर बसाने के सपने को लेकर
मूँह और भौहें सिकोड़ते हैं,
तुम बार-बार कहती हो
अपने संघर्ष की कहानी
लेकिन तुम नहीं जानती
बाज़ार ने सच को स्टंट बना दिया है,
और उसका शिकार ये समाज
नहीं पहचान पाता उस औरत को
जिसने पुरूषों की नोचती निगाहों का जवाब
अपनी धारदार जुबान के रूप में
तैयार कर लिया है।
तुम्हारे संघर्ष में लोगों को
मसाला दिखता है,
तुम्हारे काम को
आइटम का तमगा बना
अपनी संस्कारी बुद्धिमत्ता पर
उछलते हैं,
तुमने सबको
अंगूठा दिखा दिया राखी।
6 comments:
आपने चित्र बड़ा सही लगाया है.......
Raakhi ko yah mahantaa dene ke liye badhaai
आप लाख राखी को कोसें लेकिन उसने अपना इक मुकाम तो आज की इस तड़क भड़क वाली दुनिया में बना ही लिया है वर्ना कौन सा चेनल उस पर इतना पैसा खर्च करता...??
नीरज
गोस्वामी जी ने सही कहा
आप यह दोगलापन देखिये कि राखी से शादी करके पैसे वाला भी बनना है और उसके सतीत्व और भावी आचरण के बारे में सवाल भी पूछे जा रहे हैं।
rakhi ka natak Tv par dekhkar v andekha kana padta hai...
Post a Comment