Friday, September 12, 2008

मैं और तुम


मेरी ताकत मेरी कमज़ोरी

मेरा साहस मेरी सीनाजोरी हो तुम

मेरा रास्ता मेरी हद

मेरी राहत मेरा दर्द हो तुम

मेरी बेरूखी मेरी हँसी

मेरी आरजू मेरी खुशी हो तुम

ज़िन्दगी की सुबह से शुरू तुम

रात को ख्वाब बन

आँखों से सिमट आते हो

मैं तुम से हूँ

जब भी होते हो दूर

अहसास दिलाते हो.

6 comments:

मोहन वशिष्‍ठ said...

काफी अच्‍छी कविता लिखी है आपने अपराजिता जी आप सच में अपराजित ही हो नाम के अनुसार बधाई हो

neeshoo said...

bahut accha likha hai aap ne.
vakai acche bhav prastut kiye hai aap ne. good

जितेन्द़ भगत said...

एक जबरदस्‍त समर्पण भाव। अच्‍छी कवि‍ता।

जितेन्द़ भगत said...

एक जबरदस्‍त समर्पण भाव। अच्‍छी कवि‍ता।

जितेन्द़ भगत said...

और आपके द्वारा बनाया गया मधुबनी आर्ट देखकर तो मैं आपकी कला का कायल हो गया! वाकई बेहतरीन!
गणपति‍ भी!

श्रद्धा जैन said...

bhaut bhaut sunder kavita