Friday, August 8, 2008

कितना प्रेम है....


कितना प्रेम है....
क्या तभी जान पाओगे
जब मैं तुम्हें दूँ
गुलाब का लाल फूल.
अगर मैं गेंदे का फूल दूँ
या कोई फूल न भी दूँ
तो क्या जानना मुश्किल होगा
कितना प्रेम है..

मैं चाहती हूँ हमारे प्रेम को
इन छोटे-छोटे उपमानों की
या अन्य किसी सामानों की
कोई ज़रूरत न रह जाए.
हमें न हो इंतज़ार
किसी दिन विशेष का
किसी तोहफे का
कि हमें जताना पड़े
कितना प्रेम है.

6 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुंदर ..प्रेम का कोई मोल नही ..

Lovely kumari said...

क्या गुलाब और क्या गेंदा मैंने तो दुधी लता के बेल से विवाह होते देखा है .पर हमारे पढ़े लिखे सभी समाज में नही आदिवाशियों में .प्यार बस प्यार होता है गेंदा गुलाब का मोहताज़ नही

बालकिशन said...

बेहतरीन....
बहुत ही उम्दा... रचना.

Akshaya-mann said...

wah! bahut khub........

मीत said...

सही है. बहुत बढ़िया.

Udan Tashtari said...

बहुत बढिया.