Sunday, December 27, 2009

मेरी उम्मीद








दिन उगता है तो उम्मीद करती हूँ

दोपहर होने पर उम्मीद करती हूँ

दिन ढलने पर भी उम्मीद करती हूँ

रात को उसी उम्मीद के साथ

अपने बिस्तर पर

कम्बल में लिपटकर

सो जाते हैं

मैं और मेरी उम्मीद !

9 comments:

RAJNISH PARIHAR said...

बहुत ही अच्छा लिखा है आपने...

काजल कुमार Kajal Kumar said...

उम्मीद पर ही तो है ये दुनिया क़ायम

दिगम्बर नासवा said...

बहुत सुंदर लिखा है ........ मैं और मेरी उम्मीद ..... इक साथ सपने बुना करते हैं .,............

sanjay vyas said...

इक उम्‍मीद हर वक्‍त पास रहनी चाहिए.बहुत सहज लगी आपकी कविता.

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर लिखा है बधाई।

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर लिखा है बधाई।

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया...

डॉ .अनुराग said...

subhanallah!!!!!!!!

vodrajkumar said...

Supar ,,,,,