Thursday, March 1, 2012

वे दोनों




चार दीवारों के भीतर

वे दोनोँ मौजूद थे 

कभी जिनके मौन में भी थीं 

ढेर सारी बातें !!

जिनकी आँखें भीड़ में भी 

पल भर को टकराकर

रचती थीं आख्यानक !!

जिनके बीच 

संवादों, अभिव्यक्तियों के 

दौर चला करते थे,

कम लगती थी जिन्हें जिंदगी 

अपनी बातों के लिए, 

चार दीवारों के भीतर मौजूद 

वे दोनों अब भी बोलते हैं ,पर 

अब होती हैं बहसें ,

विलुप्त होती जिंदगी पर,,,

काम और पैसे के बीच,

कभी कभी वे रिश्तेदारी निभाने की सामाजिकता पर भी 

करते हैं बहस .

ताला लगा कर जाते वक्त 

जिस घर को वे बंद कर जाते हैं ,

उसे ताला खोलकर भी,

खोलते नहीं !!!!! 

Thursday, December 8, 2011

लड़की की नज़र

बस स्टैंड पर बैठी लड़की कि नज़र
डूबते सूरज कि लालिमा पर पड़ी और उसकी आँखे चमक उठी
उसने तुरंत उस बेहद दिलकश नज़ारे को साझा करने के लिए
बगल ही में बैठे प्रेमी से कहा
देखो मुझे उसमे तुम ही दिख रहे हो.....
तुम्हारा नाम आसमान कि लाल बिंदी बन गया है......
प्रेमी ने उसकी उत्सुक आँखों में डूबते हुए
हिंदी फिल्म के गाने कि एक लाइन दोहराई
''तेरे चेहरे से नज़र नहीं--
हटती नज़ारे हम क्या देखें''....
लड़की समझी बस दुनिया इसी एक पंक्ति में सिमट आई है ......
समय के घूमते पहिये पर एक शाम ऐसी भी आई
जब उसी लड़की ने डूबते सूरज को देख प्रेमी को देखा
और उसने कहा......
क्या ?
कुछ कहना चाहती हो ?

Tuesday, November 15, 2011


बाज़ार में बिक रही थी
हत्या करके लायी गई 
मछलियाँ 
ढेर पर ढेर लगी 
मरी मछलियाँ 
धड़ कटा-खून सना 
बदबू फैलाती बाज़ार भर में.

मरी मछलियों पर जुटी भीड़ 
हाथों में उठाकर 
भांपती उनका ताज़ापन
लाश का ताज़ापन.

भीड़ जुटी थी 
मुर्गे की दूकान पर 
बड़े-बड़े लोहे के पिंजरों में 
बंद सफ़ेद-गुलाबी मुर्गे या मुर्गियाँ 
मासूम आँखों से भीड़ को ताकते 
और भीड़ ताकती उनको 
भूखी निगाहों से.

अपनी बाँह के दर्द में 
तड़पड़ाते आदमी ने 
दबाकर बाँह को पकड़ा था इसतरह 
कि कोई छू ना पाए 
दर्द कहीं बढ़ ना जाए 
दुकानदार से कहता 
मेरे लिए ये मुर्गा जल्दी काट दो भाई 
मैं दर्द से खड़ा नहीं हो पा रहा!

क्षण भर में मासूम मुर्गे की देह से 
अलग कर दिए गए 
दो आँख, चोंच और पैर.  

Monday, November 29, 2010

बातें

बातें
सायास नहीं
अनायास की जाए तो
ज़्यादा सुंदर होती हैं.
बातें
लफ़्ज़ों से नहीं
आँखों से की जाए तो
ज़्यादा मार्मिक होती हैं.
बातें
हिचक से परे
हृदय के उच्छवास से आये तो
ज़्यादा स्थान लेती हैं.
बातें
क्षणिक प्रतिक्रिया से नहीं
स्वप्न के आशियाने में सजे तो
ज़्यादा उम्र पाती हैं.
इसतरह बातें
भरती है
जीवन में अर्थ
और
रचती हैं
संबंधों की गरिमा
अनवरत ....