Tuesday, November 15, 2011


बाज़ार में बिक रही थी
हत्या करके लायी गई 
मछलियाँ 
ढेर पर ढेर लगी 
मरी मछलियाँ 
धड़ कटा-खून सना 
बदबू फैलाती बाज़ार भर में.

मरी मछलियों पर जुटी भीड़ 
हाथों में उठाकर 
भांपती उनका ताज़ापन
लाश का ताज़ापन.

भीड़ जुटी थी 
मुर्गे की दूकान पर 
बड़े-बड़े लोहे के पिंजरों में 
बंद सफ़ेद-गुलाबी मुर्गे या मुर्गियाँ 
मासूम आँखों से भीड़ को ताकते 
और भीड़ ताकती उनको 
भूखी निगाहों से.

अपनी बाँह के दर्द में 
तड़पड़ाते आदमी ने 
दबाकर बाँह को पकड़ा था इसतरह 
कि कोई छू ना पाए 
दर्द कहीं बढ़ ना जाए 
दुकानदार से कहता 
मेरे लिए ये मुर्गा जल्दी काट दो भाई 
मैं दर्द से खड़ा नहीं हो पा रहा!

क्षण भर में मासूम मुर्गे की देह से 
अलग कर दिए गए 
दो आँख, चोंच और पैर.  

Monday, November 29, 2010

बातें

बातें
सायास नहीं
अनायास की जाए तो
ज़्यादा सुंदर होती हैं.
बातें
लफ़्ज़ों से नहीं
आँखों से की जाए तो
ज़्यादा मार्मिक होती हैं.
बातें
हिचक से परे
हृदय के उच्छवास से आये तो
ज़्यादा स्थान लेती हैं.
बातें
क्षणिक प्रतिक्रिया से नहीं
स्वप्न के आशियाने में सजे तो
ज़्यादा उम्र पाती हैं.
इसतरह बातें
भरती है
जीवन में अर्थ
और
रचती हैं
संबंधों की गरिमा
अनवरत ....

Thursday, October 7, 2010

माँ और मैं


माँ से पहले मैं

न तत्व थी

न अस्तित्व था

न जान थी

न जीवन था

माँ ने दिया सब कुछ मुझे

हे माँ अपर्ण हर पल तुम्हें

जीवन में आने से पहले

माँ ने मुझे अपना गर्भ दिया

जीवन में आने पर मुझे

अपने तन से भोजन दिया

जीवन का हर एक पल

आपके कर्ज में डूबा हुआ

जीवन का हर पल आपके

प्यार से सींचा हुआ

महिमा कभी न जान सकूँ

शायद आपके रूप की

भूख मेरी बढ़ रही प्रत्येक पल

आपके साथ व स्नेह की !!!



-------------रचनाकार : चेतना शर्मा


Wednesday, September 8, 2010

शादी के बाद अपना नाम















मायके से लेते हुए विदा,
बस यही ले आई थी साथ
जो कि रह सकेगा उम्र भर
मेरा ‘अपना’ 
लेकिन परम्परा, रीति के नाम पर
वह भी मुझसे छीन लिया जायेगा !!
जैसे छीन लिया
बाबा को
आई को
भाई-बहन को
उस आँगन को
जिसमें महक रहा होगा
मेरा अस्तित्व आज भी!!
छोड़ दिया अगर इसे भी-
तो खत्म हो जाएगी
मेरे जन्म की कहानी
मेरा सारा बचपन
उसने कितनी आसानी से कह दिया
तुमने आज भी
नहीं बदला अपना नाम
शादी के बाद तो लड़कियाँ
पति के नाम से ही जानी जाती हैं ना !!!