Friday, July 16, 2010

कुछ भी तो अमर नहीं












हरी घास के दरीचों पर
जहाँ मेरे तुम्हारे बीच
दुनिया का अस्तित्व नहीं होता था
तुम कितने प्रेम भरे अंदाज़ में कहते
करो जो करना चाहती हो
बस एक बार आवाज़ देना
मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा
तब तो तुम प्रेमी थे, ना!
सफ़र बहुत लम्बा नहीं था
पर हमने दूरियाँ बहुत सी तय कर लीं
जब मैं परेशान होती थी
तुम पूछ कर ही दम लेते
मेरी परेशानी का सबब क्या है
आज तुम समझते हो
परेशान रहना मेरी आदत है
“हम” तब हम थे
आज तुम “तुम” में
और मैं “मैं” में
सिमटते जा रहे हैं
सच है इस नश्वर संसार में
कुछ भी तो अमर नहीं
न सूर्य, न धरती
न ही प्रेम ।।

Friday, May 7, 2010

सिर्फ़ नाम बताइए




















नौकरी की अर्जी भरते हुए
बैंक की पर्ची भरते हुए
परिचय के समय नाम बताते हुए
मुझसे क्यों कहा जाता है
“पूरा नाम बताइए”
क्यों नाम के लिए जाति
किसी पूरक का काम करती है
क्यों संविधान ने आरक्षण लागू किया
पर नहीं बनाया वह कानून
जिसमें मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा जाता
“केवल नाम लिखें, जाति नहीं”
शायद तभी धीरे-धीरे खत्म हो जाते
विमर्श के कई मुद्दे
जिनको हमने मिटने नहीं दिया!

Tuesday, April 27, 2010

खाली कैनवास पर




















खाली कैनवास पर पहले
पेंसिल से कुछ बनाती हूँ
ताकि गलती हो तो मिटा सकूँ
जचे न तो हटा सकूँ

फिर संभल संभल कर
तैयार किए रंग भरती हूँ
अब गलती की कोई गुंजाइश नहीं

क्योंकि मैं जानती हूँ
मुझे अलग नहीं
सामान्य के बीच रहना है

Friday, April 23, 2010

कॉलेज की लड़कियाँ




















हरी-हरी घास के दरीचों पर

घने-घने पेड़ों के साये में

बैठी हैं चिड़ियाँ

जिनका कोई एक ठिकाना नहीं

एक जगह से उड़कर यहाँ आई हैं

यहाँ से उड़कर फिर कहीं जाएँगी

हँसी से गूँजते

खुस-फुसाहट और बातों से भरे

कोने-कोने को चिरजीवा कर

अमरता का नया राग गाती

कॉलेज की लड़कियाँ.