Friday, May 7, 2010

सिर्फ़ नाम बताइए




















नौकरी की अर्जी भरते हुए
बैंक की पर्ची भरते हुए
परिचय के समय नाम बताते हुए
मुझसे क्यों कहा जाता है
“पूरा नाम बताइए”
क्यों नाम के लिए जाति
किसी पूरक का काम करती है
क्यों संविधान ने आरक्षण लागू किया
पर नहीं बनाया वह कानून
जिसमें मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा जाता
“केवल नाम लिखें, जाति नहीं”
शायद तभी धीरे-धीरे खत्म हो जाते
विमर्श के कई मुद्दे
जिनको हमने मिटने नहीं दिया!

Tuesday, April 27, 2010

खाली कैनवास पर




















खाली कैनवास पर पहले
पेंसिल से कुछ बनाती हूँ
ताकि गलती हो तो मिटा सकूँ
जचे न तो हटा सकूँ

फिर संभल संभल कर
तैयार किए रंग भरती हूँ
अब गलती की कोई गुंजाइश नहीं

क्योंकि मैं जानती हूँ
मुझे अलग नहीं
सामान्य के बीच रहना है

Friday, April 23, 2010

कॉलेज की लड़कियाँ




















हरी-हरी घास के दरीचों पर

घने-घने पेड़ों के साये में

बैठी हैं चिड़ियाँ

जिनका कोई एक ठिकाना नहीं

एक जगह से उड़कर यहाँ आई हैं

यहाँ से उड़कर फिर कहीं जाएँगी

हँसी से गूँजते

खुस-फुसाहट और बातों से भरे

कोने-कोने को चिरजीवा कर

अमरता का नया राग गाती

कॉलेज की लड़कियाँ.

Wednesday, February 17, 2010

चुगलख़ोर सुर्ख गुलाब








चुगलख़ोर सुर्ख गुलाब

खोल गया मेरे सीने में दफ़्न राज़

यूं तो आंखों से छलकता था

तुमने देखा नहीं

होंठों पर थिरकता था

तुमने सुना नहीं

रोम रोम में उछलता था

तुमने छुआ नहीं

और चुगलख़ोर गुलाब ने

सब कह दिया!