Tuesday, April 27, 2010
खाली कैनवास पर
खाली कैनवास पर पहले
पेंसिल से कुछ बनाती हूँ
ताकि गलती हो तो मिटा सकूँ
जचे न तो हटा सकूँ
फिर संभल संभल कर
तैयार किए रंग भरती हूँ
अब गलती की कोई गुंजाइश नहीं
क्योंकि मैं जानती हूँ
मुझे अलग नहीं
सामान्य के बीच रहना है
Friday, April 23, 2010
कॉलेज की लड़कियाँ
हरी-हरी घास के दरीचों पर
घने-घने पेड़ों के साये में
बैठी हैं चिड़ियाँ
जिनका कोई एक ठिकाना नहीं
एक जगह से उड़कर यहाँ आई हैं
यहाँ से उड़कर फिर कहीं जाएँगी
हँसी से गूँजते
खुस-फुसाहट और बातों से भरे
कोने-कोने को चिरजीवा कर
अमरता का नया राग गाती
कॉलेज की लड़कियाँ.
Wednesday, February 17, 2010
चुगलख़ोर सुर्ख गुलाब
चुगलख़ोर सुर्ख गुलाब
खोल गया मेरे सीने में दफ़्न राज़
यूं तो आंखों से छलकता था
तुमने देखा नहीं
होंठों पर थिरकता था
तुमने सुना नहीं
रोम रोम में उछलता था
तुमने छुआ नहीं
और चुगलख़ोर गुलाब ने
सब कह दिया!
Sunday, February 7, 2010
थक गई हूँ रोज-रोज
थक गई हूँ रोज-रोज
पतझड को
बुहारते बुहारते,
गिर जाने दो
जमीं पर
सारे पत्तों को
एक एक कर,
कि
मैं समेट सकूँ
एक साथ सबको।
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