Saturday, June 21, 2008

दान-पुण्य (लघुकथा)










"क्या है! जब भी किताब लेकर बैठती हूँ दरवाजे पर घंटी ज़रूर बजती है. खोलने भी कोई नहीं आएगा."
दरवाजा खोला तो सामने दस-बारह साल की एक छोटी लड़की फटे मैले फ्रॉक में खड़ी थी. शरीर और बालों पर गर्द इतनी जमी थी मानों सालों से पानी की एक बूँद ने भी इसे नहीं छूआ...
"क्या है?"
मैंने एक ही पल में झुंझलाते हुए बोल तो दिया लेकिन उसका चेहरा देखकर खुद की तमीज़ पर शर्मसार हो गई. मैं बुआ को आवाज़ लगा एक कोने पर खड़ी हो गई. बुआ आई और उसे देखते ही चिल्ला उठी,-
"क्या है री! तूने घंटी को छूआ कैसे, दूर हो......क्या चाहिए?"
"माँ जी भूख से बेहाल हो रही हूँ. मेरे छोटे भाई बहनों ने भी कुछ नहीं खाया, कुछ खाना-दाना दे दो माँई." बुआ ने आँखें दिखाकर कहा,-
"अच्छा! खाना..दाना.. तुम लोगों को मैं खूब जानती हूँ, दो पैसे कमाने में हड्डियाँ टूटती है. माँगने से काम चल जाए तो कमाए कौन. चल जा कुछ नहीं है, रोज़-रोज़ चले आते हैं."
और बुआ ने दरवाजा उसके मुँह पर दे मारा.
मैं भी सोचती हुई-सी कि वो लड़की सच कहती होगी या झूठ, अपनी कुर्सी पर जा ही रही थी कि दरवाजे पर घंटी फिर बजी. अबकी बार ज़ोर से आवाज़ आई,-
"शनिदान, जो करेगा शनि का दान उसका होगा महाकल्याण. जय शनिदान. आज अमावस का शनिवार है, बेटा कुछ दान दक्षिणा दो."
मैं मुड़ती कि इससे पहले बुआ थाली में बहुत से चावल, खूब सारा आँटा, जमे हुए देशी घी का एक लौंदा, नमक इत्यादि सीदा और ग्यारह रूपये कुर्ते पैजामे के साथ लेकर दरवाजे की ओर दौड़ पड़ीं. हाथ जोड़कर शनिदान को दान अर्पण किया और बोली,-
"हे शनि महाराज, बस अपनी कृपा बनाए रखना."
दरवाजा आराम से बंद करके बुआ रसोई घर में चली गई.

Thursday, June 19, 2008

चेहरा










भिखारियों के नाम नहीं होते

होते हैं सिर्फ चेहरे,

चेहरा लंगड़े का, लूले का,

चेहरा भूखे काले नंगे बच्चे का,

चेहरा सूखी छाती से चिपकाये

माँ और उसके लाल का,

चेहरा बूढ़े क्षीणकाय का,

चेहरा सर्दी में फटे चीथड़ों के बीच

ठिठुरती बुढ़िया का,

चेहरा हाथ पैर तोड़कर

भिखारी बना दी गई गुड़िया का,

भिखारी सिर्फ चेहरा है?

जो टकराते ही

हाथ जेब में जाता है.
------------------------- * अपराजिता *

Wednesday, June 18, 2008

ज़रा सुनिये









ज़रा सुनिये,
कभी कभी
एक लम्हा फुरसत का
एक अपनी हसरत का
एक अदद मुस्कराने का
अदना सा मेरे सपनों में आने का
निकाल लिया कीजिए.
और हाँ,
एक लम्हा बतियाने का
एक अपनी सुनाने का
एक अदद इबादत का
अदना सा मुझे शरारत का
दे दिया कीजिए.

Monday, June 16, 2008

शेष है










शब्दों का एक सेतु
इन भावों के बीच बनना शेष है,
जानती हूँ शब्द नहीं प्रमाण
फिर भी उससे बंधे हैं क्यों प्राण?
तुमने कहा, करो और प्रतीक्षा,
तब तक करती रही मैं
अपने ही हृदय की समीक्षा.
किन्तु तब भी, यही एक खेद है
शब्दों का एक सेतु
इन भावों के बीच बनना शेष है.
चाहते हैं भाव ये,
शब्द का आधार
जिससे न उलझे रह सके
हृदय के उद्गार.
तुम कहो मैं सुनूँ
जीवन का शेष बनूँ.
यही एक स्वप्न है, यही एक सेतु है.
शब्दों का एक सेतु
इन भावों के बीच बनना शेष है.